Dain Mai Temple Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के गुंडरदेही ब्लॉक में स्थित झींका गांव एक ऐसी अनोखी लोक परंपरा का केंद्र है, जहां “डायन माई” या “परेतिन दाई” के नाम से जाना जाने वाला मंदिर स्थानीय आस्था का प्रतीक है। यह मंदिर सिकोसा से अर्जुन्दा जाने वाले मार्ग पर स्थित है और पूरे प्रदेश में अपनी विचित्र मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। आमतौर पर डायन या प्रेत को बुरी शक्ति माना जाता है, लेकिन यहां के ग्रामीण इसे माता के रूप में पूजते हैं। मंदिर की स्थापना सैकड़ों वर्ष पुरानी है, लगभग 200 साल से अधिक, और यह लोकविश्वास का एक जीवंत उदाहरण है जहां डर और श्रद्धा का अनोखा संगम देखने को मिलता है। दूर-दूर से भक्त यहां मनोकामनाएं लेकर आते हैं, खासकर नवरात्रि के दौरान।

क्या है मंदिर की मान्यता
मंदिर की मान्यता एक दुखद घटना से जुड़ी है। स्थानीय कथाओं के अनुसार, एक महिला की असमय मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी आत्मा गांव में भय फैलाने लगी। ग्रामीणों ने इसे डायन या परेतिन माना, लेकिन जब अजीब घटनाएं बढ़ गईं, तो उन्होंने पूजा-अर्चना शुरू की। इससे आत्मा शांत हो गई और महिला को देवी का रूप मान लिया गया। आज “परेतिन दाई” को शांत और कृपालु माता माना जाता है, जो अच्छे लोगों को आशीर्वाद देती है, लेकिन तिरस्कार करने वालों के साथ अनहोनी घटित करती है।
विशेष रूप से, यह माता सूनी गोद भरने के लिए जानी जाती है। नि:संतान दंपतियां यहां मन्नत मांगने आते हैं और सफलता मिलने पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। ग्रामीण गैंदलाल मिरी जैसे बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर पहले एक नीम के पेड़ से जुड़ा था, जहां माता का प्रमाण (प्रतीक) आज भी मौजूद है। बिना सिर झुकाए गुजरने पर वाहन खराब हो जाते हैं या अन्य परेशानियां होती हैं, लेकिन नारियल चढ़ाने पर सब ठीक हो जाता है। यह मान्यता सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है और गांव की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
नवरात्रि में विशेष महत्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में मंदिर में विशेष अनुष्ठान होते हैं। यहां 100 से अधिक ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं और नौ दिनों तक भक्तों का तांता लगा रहता है। माता के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जो दुर्गा के रूपों से प्रेरित है। भक्त नंगे पैर आते हैं और कलश स्थापित करते हैं। मान्यता है कि माता विपत्तियों से बचाती है और सच्चे मन से प्रार्थना करने वालों की इच्छाएं पूरी करती है। अनजान राहगीरों को क्षमा करने वाली यह देवी किसी का बुरा नहीं चाहती, लेकिन जानबूझकर अनदेखा करने पर सजा देती है।

डायन माई की पूजा
यह पूजा छत्तीसगढ़ की आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति की अनूठी विशेषता है, जहां नकारात्मक मानी जाने वाली शक्ति को सकारात्मक रूप दिया जाता है। झींका गांव के ठेठवार (यादव) समुदाय के लोग रोज दूध बेचने जाते समय थोड़ा दूध चढ़ाते हैं, वरना दूध फट जाता है। मंदिर में कोई औपचारिक पुजारी नहीं, बल्कि ग्रामीण सामूहिक रूप से पूजा करते हैं। यह परंपरा डर को आस्था में बदलने का उदाहरण है, जहां प्रेतात्मा को दाई (मां) का दर्जा दिया गया। पूरे बालोद जिले से लोग आते हैं, और मंदिर प्रदेश स्तर पर प्रसिद्ध है। नवरात्रि में विशेष पूजा के अलावा, दैनिक जीवन में भी यह परंपरा जीवित है।
“डायन माई” या “परेतिन दाई” की चढ़ावा
मंदिर में चढ़ावा अनोखा है। मुख्य रूप से ईंटें चढ़ाई जाती हैं, खासकर ईंट ले जाने वाले वाहन चालक कुछ ईंटें छोड़ जाते हैं। इन ईंटों से गांव के विकास कार्य जैसे चबूतरा, नाली आदि बनाए जाते हैं। दूध, नारियल, फल और पैसे भी चढ़ाए जाते हैं। मालवाहक वाहनों को कुछ हिस्सा छोड़ना पड़ता है, वरना परेशानी होती है। नि:संतान महिलाएं संतान प्राप्ति पर विशेष चढ़ावा चढ़ाती हैं। ईंटों की लंबी कतारें मंदिर के पास हमेशा दिखाई देती हैं।

Dain Mai Temple Chhattisgarh: चढ़ावे का उपयोग
चढ़ावा गांव के कल्याण के लिए उपयोग होता है। ईंटें विकास कार्यों में लगती हैं, जबकि अन्य सामग्री पूजा में। यह परंपरा सामुदायिक सहयोग को बढ़ावा देती है। मान्यता है कि बिना चढ़ावा दिए गुजरना अशुभ है, लेकिन अनजान को माफ किया जाता है।
“डायन माई” का निर्माण
मंदिर का निर्माण लगभग 200 वर्ष पूर्व हुआ। शुरू में यह नीम के पेड़ के नीचे एक चबूतरा मात्र था, जहां माता का प्रतीक स्थापित था। मान्यता बढ़ने पर जन सहयोग से मंदिर बनाया गया। प्रतिमा की स्थापना 150 वर्ष पूर्व हुई। ईंटें चढ़ावे से ही मंदिर बना, जो अनोखा है।
वर्तमान स्वरूप
आज मंदिर छोटा लेकिन सुंदर है, पेड़ के साथ जुड़ा हुआ। नवरात्रि में सजावट होती है। रखरखाव ग्रामीण करते हैं। यह स्थानीय संस्कृति का प्रतीक बना हुआ है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ की आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहां डर को देवी में बदल दिया गया।

