Karila Dham Temple Mp: राजधानी भोपाल के पास एक ऐसा स्थान है, जहां माता सीता अपने स्वामी मतलब भगवान राम के बिना विरामान हैं। यह मंदिर भोपाल से लगभग 165 किलोमीटर दूर अशोकनगर जिले की पहाड़ी पर स्थित है, जो पूरे प्रदेश में करीला धाम मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
बताया जाता है कि, यहां माता सीता के साथ लव- कुश और महर्षि वाल्मीकि भी प्रतिमा स्वरुप विराजमान है। माता सीता के साथ इन सबकी भी की पूजा की जाती है।
आखिर सीता माता बस क्यों हैं विराजमान
बताया जाता है, देश के जितने भी माता सीता के मंदिर हैं, उन मंदिरों में माता सीता के साथ भगवान राम, लक्ष्मण और भगवान हनुमान विराजमान है। लेकिन यह देश का पहला ऐसा मंदिर हैं जहा माता सीता अकेले विराजमान है। उनके साथ राम जी के ना विराजमान होने का कारण ये है, कि यह वहीं स्थान है जहां माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था, जब लव और कुश का जन्म हुआ तब माता सीता वनवास में महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में रहती थी।

माता सीता वनवास में क्यो रहना पड़ा था अकेले
पौराणिक शास्त्रो के अनुसार, जब रामायण काल के दौरान भगवान राम को वनवास भेजा गया था, तब माता सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ वनवास गए, तब वहां एक बार राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण साधु के भेष में आया और माता सीता का हरण कर लिया, जिसके बाद काफी समय तक सीता माता रावण के चंगुल में रही, फिर राम ने रावण का वध किया और माता को वापस ले आएं, लेकिन नगर के सारे लोग माता के चरित्र पर उंगुली उठाने लगे, जिससे मजबूर होकर धर्म का पालन करने की वजह से राम जी ने माता सीता को 14 वर्ष का वनवास दे दिया। उस बीच माता ने अपने दोनों पुत्रो को जन्म दिया।
राई नृत्य का है यहां विशेष महत्व
कहा जाता हैं यहां रंगपंचमी के दिन लव कुश का जन्मदिन मनाया जाता है। इस दौरान यहां मेले का आयोजन होता है और श्रद्धालु दूर – दूर से यहां भगवान के दर्शन करने आते हैं। इस दिन ही महार्षि वाल्मिकी की गुफा खोली जाती है। इस दिन भक्त बड़ी संख्या में अपनी मन्नत मांगने यहां आते हैं।

इस दिन बेड़नियां जाति की हजारों नृत्यांगनाएं जमकर राई नृत्य करती है।
मन्नत पूरी होने पर भक्त करते हैं ये काम
स्थानीय निवासी बताते है कि, जिन दंपत्ति के बच्चे नहीं होते हैं, वो अपने संतान की प्राप्ति के लिए यहां संतान कमान के साथ मन्नत मांगने आते हैं। वहीं जब मन्नत पूरी हो जाती है, तब भक्त इस मंदिर पर राई नृत्य करवाते हैं।
यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था के साथ – साथ सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।

