Gwalior news: मध्यभारत की ऐतिहासिक धरोहरों में ग्वालियर का मोती महल एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह महल कभी सिंधिया राजघराने का सचिवालय था और स्वतंत्रता के बाद मध्यभारत की पहली विधानसभा के रूप में कार्य करता रहा।
मोती महल का निर्माण 18वीं शताब्दी में महाराजा जयाजीराव सिंधिया ने कराया था। इसे जयविलास पैलेस के साथ-साथ बनाया गया था, जहां जयविलास पैलेस राजमहल के रूप में था, वहीं मोती महल प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र रहा।
Gwalior news: मोती महल प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र रहा

इसे सिंधियाओं का सचिवालय भी कहा जाता था। स्वतंत्रता के बाद 1947 से 31 अक्टूबर 1956 तक इस महल में मध्यभारत की विधानसभा बैठती रही, और यहीं पर राज्य के पहले मुख्यमंत्री ने शपथ ली।
दीवारों पर मोतियों की नक्काशी

महल की वास्तुकला और भव्यता इसकी ऐतिहासिक गरिमा को दर्शाती है। दीवारों पर मोतियों की नक्काशी और छतों पर 24 कैरेट सोने का काम आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
पुणे के पेशवा पैलेस की तर्ज पर किया गया
Gwalior news: तीसरी मंजिल पर स्थित ‘रागरागिणी कक्ष’ में 64 रागिणियों के चित्र हैं, जो संगीत और संस्कृति की झलक पेश करते हैं। महल का निर्माण पुणे के पेशवा पैलेस की तर्ज पर किया गया था।
दरबार हॉल में बनाए गए झरोखे शाही महिलाओं को बैठकर राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों को देखने की अनुमति देते थे, जिससे इसे महिलाओं के लिए एक प्रकार का शिक्षा केंद्र भी माना जाता था।
विशाल झूमर अपनी भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध
मोती महल में 4000 से अधिक कमरे हैं, जिनमें कई पुराने जमाने की पेंटिंग, शीशाकारी और भव्य सजावट आज भी संरक्षित हैं। दरबार हॉल में स्थित विशाल झूमर अपनी भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
यह झूमर जर्मनी की महारानी के रॉयल पैलेस के झूमर से तुलना में आता है। महल में तत्कालीन समय में छोटी-बड़ी 22 रियासतों का प्रशासन संचालित होता था।
वैभवशाली अतीत की जीवंत कहानी

आज मोती महल न केवल ग्वालियर की शान और गौरव का प्रतीक है, बल्कि मध्यभारत और मध्यप्रदेश के वैभवशाली अतीत की जीवंत कहानी भी कहता है।
यह स्थल पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है और पर्यटक इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सरकार अब इस धरोहर के संरक्षण और जीर्णोद्धार पर तेजी से काम कर रही है,
सांस्कृतिक वैभव को समझ और सराह सकें
ताकि आने वाली पीढ़ियां मध्यभारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव को समझ और सराह सकें।
मोती महल केवल एक भवन नहीं है, बल्कि ग्वालियर की ऐतिहासिक पहचान और मध्यभारत की पहली विधानसभा की समृद्ध विरासत का सजीव दस्तावेज़ है।

