Balaghat tample: बालाघाट जिला अपनी हरियाली और वनों के लिए मशहूर है। यहां पहले से ही कान्हा नेशनल पार्क पर्यटकों का आकर्षण बना हुआ था, और अब सोनेवानी कंजर्वेशन रिजर्व भी लोगों के लिए खास जगह बनता जा रहा है।
घने जंगल और वन्य जीव तो यहां की पहचान हैं ही,
लेकिन…
इसी जंगल के बीच स्थित एक प्राचीन गणेश देव मंदिर इन दिनों आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है।
Balaghat tample: घने जंगलों में बसा है मंदिर

सोनेवानी कंजर्वेशन रिजर्व के भीतर चिखलाबड्डी और सोनेवानी ग्राम के बीच स्थित यह मंदिर पहुंचने में काफी कठिन माना जाता है।
यहां तक पहुंचने के लिए घने जंगल, पहाड़ और नदियों को पार करना पड़ता है।
साथ ही, बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे खतरनाक जानवरों का खतरा भी यात्रा को जोखिम भरा बनाता है।
यही कारण है कि इस मंदिर में पूरे साल में केवल एक बार ही श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति मिलती है।
Balaghat tample: साल में एक बार खुलता है द्वार

Balaghat tample: गणेश देव मंदिर केवल गणेश चतुर्थी के दिन आम लोगों के लिए खोला जाता है।
इस दिन बालाघाट और सिवनी जिले के आसपास के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ दर्शन करने पहुंचते हैं।
साल में बाकी समय मंदिर बंद रहता है और लोगों की एंट्री पर रोक होती है।
प्राचीन मूर्ति और मान्यताएं
मंदिर में स्थापित गणपति जी की प्रतिमा चौदहवीं शताब्दी की बताई जाती है।
करीब पांच फीट ऊंची मूर्ति में गणेश जी मूषक पर सवार नजर आते हैं।
स्थानीय मान्यता है कि इस प्रतिमा के नीचे कोई किला दबा हुआ है। जंगल के भीतर होने के कारण बहुत कम लोग इस मंदिर के बारे में जानते हैं।
मूर्ति हटाने की कोशिश और चमत्कार

ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 40 साल पहले सिवनी जिले के कुछ लोग इस प्रतिमा को अपने गांव ले जाना चाहते थे।
उन्होंने ट्रैक्टर से मूर्ति उठाने की कोशिश की, लेकिन ट्रैक्टर बीच में ही टूट गया।
आश्चर्य की बात यह रही कि मूर्ति अपनी जगह से हिली तक नहीं और वहीं स्थापित रही।
वन विभाग की चेतावनी
वन विभाग ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आगाह किया है कि मंदिर जाने के रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। इसीलिए लोग केवल अनुमति प्राप्त कर ही वहां जाएं और सतर्कता बरतें।
इस प्रकार जंगलों के बीच छिपा गणेश देव मंदिर न सिर्फ आस्था और विश्वास का प्रतीक है….
बल्कि रहस्यमयी कथाओं और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

