Ujjain News: आज के दौर में जहां युवा बेहतर करियर और आकर्षक सैलरी के लिए विदेश जाने का सपना देखते हैं, वहीं बिहार के सुपौल के रहने वाले 27 वर्षीय महंत सत्यानंद ने एक अलग ही राह चुनी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास विदेश में शानदार नौकरी करने के अवसर थे। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी और वियतनाम से भी उन्हें काम के प्रस्ताव मिले, लेकिन उन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं के बजाय अध्यात्म को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। आज वे उज्जैन के बड़ा उदासीन अखाड़े में महंत की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इकलौती संतान होने के बावजूद अपनाया संन्यास
महंत सत्यानंद की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। सामान्य तौर पर परिवार की जिम्मेदारियों और भविष्य की उम्मीदों के बीच युवा करियर को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन सत्यानंद ने जीवन के लिए एक बिल्कुल अलग लक्ष्य निर्धारित किया।
उनका झुकाव शुरू से ही अध्यात्म, योग और धार्मिक परंपराओं की ओर रहा। इसी रुचि ने धीरे-धीरे उन्हें संत जीवन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने अपने उपलब्ध अवसरों को पीछे छोड़कर भगवान की भक्ति और समाज कल्याण को प्राथमिकता दी।
ऑस्ट्रेलिया से मिला था आकर्षक नौकरी का प्रस्ताव
सत्यानंद के मुताबिक, पढ़ाई के दौरान ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी में योग प्रशिक्षक के तौर पर काम करने का प्रस्ताव मिला था। यह नियुक्ति तीन वर्षों के लिए थी, जिसमें उन्हें हर महीने करीब 2.25 लाख रुपये वेतन मिलने की बात कही गई थी। इस हिसाब से सालाना पैकेज लगभग 27 लाख रुपये बैठता है।
इसके अलावा वियतनाम से भी उन्हें नौकरी का ऑफर मिला था। विदेश में बेहतर आर्थिक भविष्य बनाने के तमाम अवसर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।
उनका कहना है कि महापुरुषों के विचारों और सनातन परंपराओं से प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन ईश्वर की सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।
2019 में ली संन्यास की दीक्षा
महंत सत्यानंद ने वर्ष 2019 में दीक्षा ग्रहण कर संन्यास जीवन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग धार्मिक केंद्रों पर अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।
वर्ष 2020 में उन्हें बिहार के गया में महंत की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद हरिद्वार कुंभ के प्रबंधन से जुड़ने का अवसर मिला। आगे चलकर उन्होंने वाराणसी में भी महंत पद की जिम्मेदारी संभाली।
अब उज्जैन के बड़ा उदासीन अखाड़े में संभाल रहे जिम्मेदारी
वर्तमान में महंत सत्यानंद उज्जैन स्थित बड़ा उदासीन अखाड़े में रहकर धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। यहां वे लोगों को अध्यात्म, भक्ति और भारतीय धार्मिक परंपराओं के बारे में मार्गदर्शन देते हैं।
महज 27 वर्ष की उम्र में संन्यास का रास्ता चुनने वाले सत्यानंद की जीवन यात्रा युवाओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। एक ओर उनके सामने विदेश में आकर्षक करियर बनाने का विकल्प था, तो दूसरी ओर उन्होंने आध्यात्मिक जीवन को अपना लक्ष्य बनाया। उनकी कहानी करियर, महत्वाकांक्षा और जीवन के उद्देश्य को लेकर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
