शिवरात्रि में मंदिर के दर्शन का हैं विशेष महत्व रात में रुकने से मिल जाता हैं मोक्ष
Dharma Rajeshwar Temple Mystery 2025: देश की हृदय यानी की मध्य प्रदेश में कहीं प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर मौजूद हैं उनमें से ही एक ऐसा मंदिर है जो की एक अलग ही रहस्यमयी हैं.
Dharma Rajeshwar Temple Mystery 2025 वो इसलिए चूंकि…
इसमें शिखर पहले बना और नीचे का हिस्सा यानी नींव का निर्माण बाद में हुआ ऐसा कहा जाता है की मंदिर को विशाल चट्टान से काटकर बनाया गया था |
गरोठ तहसील में हैं जो की धर्मराजेश्वर मंदिर
यहाँ मंदिर मंदसौर जिला मुख्यालय से लगभग 106 किलोमीटर दूर गरोठ तहसील में हैं जो की धर्मराजेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता हैं.
वास्तुकला का एक जीता जागता उदाहरण

एक विशाल चट्टान को काटकर इस मंदिर को बनाया गया हैं | ये मंदिर वास्तुकला का एक जीता जागता उदाहरण हैं और इस मंदिर को गुफा मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं।
मंदिर की वास्तुकला
कैलाश मंदिर के जैसे ही हैं इस मंदिर की वास्तुकला….
ये मंदिर एक पिरामिड के आकार का है जो की
केंद्र में 14.53 मीटर की ऊंचा
और 10 मीटर की चौड़ा हैं |

उत्तर भारतीय वास्तु शैली
धर्मराजेश्वर मंदिर के शिखर को उत्तर भारतीय वास्तु शैली में डिजाइन किया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की मूर्तियों हैं।
मंदिर जमीन के अंदर बना है
धर्मराजेश्वर मंदिर में सूर्य की पहली किरण गर्भगृह तक जाती है और ये भी एक चमत्कारी हैं क्यूंकी ये मंदिर जमीन के अंदर बना है।

बताते हैं की…
इस सुन्दर दृश्य को देखकर ऐसा लगता है जैसे भगवान सूर्य घोड़े पर सवार होकर शिव जी और विष्णु जी के दर्शन के लिए आए हों।
शिव जी के वाहन नंदी की प्रतिमा नहीं
इस मंदिर में शिवलिंग हैं लेकिन पूरे मंदिर में शिव जी के वाहन नंदी की प्रतिमा नहीं है, इसलिए ये मंदिर ‘हरिहर’ है। ‘हरि’ माने भगवान-विष्णु और ‘हर’ माने महादेव है।

रात में रुकता हैं तो उसे मोक्ष मिलता हैं
आज भी इस मंदिर की ऐसी मान्यता है की शिवरात्रि के दिन यदि कोई यहाँ रात में रुकता हैं तो उसे मोक्ष मिलता हैं।
मंदिर के दर्शन
मंदिर के दर्शन करने के लिए जमीन की 9 फुट नीचे तक जाना होता हैं। इसके लिए सीढ़ियों से उतरकर नीचे जाना होता है सीढ़ियों के दोनों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं करीब 5 फुट चौडे गलियारे से गुजरते ही सामने मंदिर नजर आता है।

आसपास छोटे सात मंदिर हैं
इस मंदिर के तलघर में शिवलिंग है और वही गर्भगृह में ऊपर की तरफ भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा हैं। मंदिर के चारों ओर कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं और आसपास छोटे सात मंदिर में हैं जिनमे यह मूर्तियां हैं।

भगवान बुद्ध की अलग अलग मुद्राओं में प्रतिमाएं
मंदिर के बाई तरफ कई गुफाएं हैं, जिसमे भगवान बुद्ध की अलग अलग मुद्राओं में प्रतिमाएं आज भी वही पुराना इतिहास दौरा रही हैं।
8वीं शताब्दी का मंदिर
इस मंदिर के बारे में बताया जाता है की यह मंदिर तकरीबन 8वीं शताब्दी का हैं हालांकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं हैं।
भगवान गणेश,
लक्ष्मी,
पार्वती,
गरुड़ महाराज

की मूर्ति मंदिर की दीवारों पर हैं।
राष्ट्रकूट नरेशों के द्वारा बनवाया गया
इस मंदिर को राष्ट्रकूट नरेशों के द्वारा बनवाया गया था ऐसा बताया जाता हैं। इस मंदिर के इतिहास में ‘रॉक कट टै पल’ के नाम से भी जानते हैं जिसका मतलब होता है की पत्थर की चट्टान को तराश कर की गई कारीगरी।
अगर आसपास के लोगों की बात को माने तो उनका कहना है इस मंदिर को पांडवों द्वारा मनाया गया था।

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