Parshuram Mata Vadh Katha:भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जन्म से ब्राह्मण थे, लेकिन कर्म से क्षत्रिय। उन्होंने हमेशा धर्म की रक्षा के लिए परशु उठाया। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र परशुराम ने सहस्त्रबाहु जैसे क्रूर राजाओं का वध किया और इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-शून्य बनाने का संकल्प लिया। लेकिन सबसे चर्चित घटना है – अपनी ही मां का वध। आइए जानते हैं कि, आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया?
मां रेणुका का क्षण भर के लिए मन हुआ था भ्रमित
एक दिन माता रेणुका सरोवर में स्नान करने गईं। वहां उन्होंने राजा चित्ररथ को नौका-विहार करते देखा। क्षणभर के लिए उनके मन में विकार उत्पन्न हो गया। ऋषि जमदग्नि ने उनके मन की बात जान ली।
ऋषि जमदग्नि का क्रोध, दिया आदेश
क्रोध में ऋषि जमदग्नि ने अपने सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने का आदेश दिया। लेकिन मां के मोह के कारण बड़े चारों पुत्र यह काम नहीं कर सके। इससे ऋषि का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने सभी पुत्रों को बुद्धि-विवेक खोने का श्राप दे दिया।

परशुराम ने पिता की आज्ञा का किया पालन
फिर जमदग्नि ऋषि ने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया, तो उन्होंने बिना किसी हिचक के अपना परशु उठाया और माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने आंखों में आंशु भरे दिल को कठोर कर अपनी माता को मारने का कदम उठाया।

पिता प्रसन्न, 3 वरदान मिले
यह देख महर्षि जमदग्नि बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने परशुराम से तीन वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने 3 वरदान मांगे, जिसमें से
- पहला वरदान माता रेणुका को फिर से जीवित करना ।
- दूसरा भाइयों की बुद्धि और विवेक वापस लौटाना।
- तीसरा वरदान खुद को अजेय, दीर्घायु और अमर बनाने का मांगा।
महर्षि ने तीनों वरदान दे दिए। फिर माता रेणुका जीवित हो गईं, भाइयों की बुद्धि वापस आई और परशुराम सदा के लिए अजेय व अमर हो गए।
क्या कहती है यह कथा?
यह घटना पिता की आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्म पालन का उदाहरण है। साथ ही यह दिखाती है कि भगवान विष्णु के अवतार भी कभी-कभी कठोर निर्णय लेने को मजबूर होते हैं। परशुराम जी का यह त्याग आज भी हिंदू धर्म की कथाओं में अनुपम माना जाता है।
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