Importance of Crow Pitru Paksha: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। पितृपक्ष हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक होता है। इस पूरे पखवाड़े को पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए समर्पित माना जाता है, लोग इस दौरान तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।
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पितृपक्ष से जुड़ी कई परंपराएं और मान्यताएं है, जिसमें से एक है कौवे को खाना देना। इस आर्टिकल में आज आपको बताएंगे कि आखिर कौवे को पितृपक्ष में खाना खिलाने की परंपरा क्यों हैं?
कौवे और पितरों का संबंध…
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कौवे को पितरों का प्रतीक माना गया है, कहा जाता है कि श्राद्ध में कौवे को दिया गया भोजन सीधे पितरों के पास पहुंचता है, और इससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यही वजह है कि श्राद्धकर्म के दौरान सबसे पहले कौवे को भोजन कराया जाता है।

रामयुग से जुड़ी है पौराणिक कथा….
पौराणिक कथा के अनुसार, कौवे को भोजन कराने की परंपरा का संबंध त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है, कहा जाता है, त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम ने धरती में अवतार लिया, तब एक बार इंद्रदेव के पुत्र जयंत ने कौवे का रुप धारण कर लिया और माता सीता के पैर में अपनी चोंच से हमला कर दिया।
इससे भगवान श्रीराम क्रोधित हो गए और एक तिनके से बाण बनाकर जयंत पर वार किया, वह बाण इतना शक्तिशाली था कि जयंत किसी भी लोक में जाकर उससे बच नहीं सका। और उसकी आंख फूट गई।
एक और पौराणिक कथा..
गरुड़ पुराण के अनुसार, जब भगवान राम वनवास के दौरान अपने पिता दशरथ का श्राद्ध कर रहे थे, तब उन्होंने कौवे को पितरों का दूत मानकर उन्हें भोजन अर्पित किया था। यह माना जाता है कि कौवे यमराज के दूत होते हैं और पितृपक्ष में हमारे पितृ इन्हीं के रूप में धरती पर आते हैं। इसलिए, कौवे को भोजन कराने से पितरों को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

जयंत को हुआ पछतावा, मिला वरदान..
आखिर में जयंत को अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने भागवान राम से क्षमा मांगी और दया की प्रार्थना की। भगवान ने उसे क्षमा कर दिया और उसे वरदान दिया कि- “श्राद्ध के दौरान तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों तक पहुंचेगा।” तभी से कौवों को भोजन कराना श्राद्धकर्म का जरुरी हिस्सा बन गया।

श्राद्ध में कौवे को भोजन कराने का महत्व…
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कौवा भोजन स्वीकार कर लेता है, तो यह संकेत माना जाता है कि पितर प्रसन्न हुए हैं। और उन्होंने भोजन ग्रहण कर लिया है। इससे परिवार पर पितरों का आशीर्वाद बना रहता है। घर में सुख – समृद्धि आती है।
Note – The information in this article is based on traditional beliefs and scriptures. It is meant only for general awareness. We do not claim authenticity of any personal faith or ritual.

