Story of Ganga Descent: सनातन धर्म में गंगा नदी को सबसे पवित्र नदी माना जाता है। उन्हें हिन्दु धर्म में मां का दर्जा दिया गया है।
मान्यता है कि, गंगा नदी इतनी पवित्र मानी जाती है कि अगर कोई गंगा नदी में स्नान कर ले तो उसके सारे पाप धुल जाते हैं। अगर मृत व्यक्ति की अस्थियां इस नदीं में प्रवाहित की जाए तो उनकी आत्मा को मुक्ति मिल जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर धरती पर मां गंगा का अवतरण कैसे हुआ?
मां गंगा धरती पर कैसे आईं?
पहली कथा
शास्त्रों के अनुसार, राजा सागर के वंशज भगीरथ से जुड़ी एक कथा है कहा जाता है कि- ‘राजा सागर ने एक यज्ञ आयोजित किया था और इसके घोड़े को इंद्र चुरा ले गया। घोड़े की तलाश में राजा सागर के 60,000 पुत्रों ने पूरी पृथ्वी में तबाही मचा दी और अंत में वह घोड़ा राजा सागर को महर्षि कपिल के आश्रम में मिला।

उन्हें लगा कि तपस्या में लीन कपिल ऋषि ही दोषी है, जिससे उनकी तपस्या भंग कर दी, जिससे वो क्रोधित होकर उन्होंने सभी 60,000 पुत्रों को भस्म कर दिया, जिससे उनकी आत्माएं भटकने लगी। वो अशांत हो गईं। इसके बाद उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए भगीरथ ने तपस्या करने का संकल्प लिया।
भगीरथ ने की तपस्या से गंगा का हुआ अवतरण
राजा भगीरथ ने संकल्प लिया कि- ‘वो अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाएंगे। इसके लिए उन्होंने हजारों सालो तक कठोर तपस्या की, इससे प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन दिया तब उन्होंने उनसे प्रार्थना की कि, गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारें, जिससे वो अपने पूर्वजों की अस्थियां प्रवाहित कर उन्हें मुक्ति दिला सके।
ब्रह्मा जी ने जबाव में कहा, “गंगा को धरती पर भेजना तो आसान है, क्योकि उनकी तेज धारा पृथ्वी को नष्ट कर सकती है। तुम्हें पहले ऐसे देवता को प्रसन्न करना होगा जो उसकी धारा को नियंत्रित कर सके।”
भोलेनाथ की तपस्या, फिर महादेव बने गंगाधर
ब्रम्हा जी के कहने पर राजा भगीरथ ने कैलाश पर्वत पर बैठकर भगवान शिव की कई सालों तक तपस्या की। कई साल तपस्या करने के बाद भगवान शिव उनसे प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपनी जटाओं में मां गंगा की तेज प्रवाह को जटाओं में संभालने का वरदान दिया, जिससे उसकी वेगवती धारा से पृथ्वी को कोई नुकसान न हो।

जैसे ही गंगा स्वर्ग से नीचे उतरने लगी। भगवान भोलेनाथ अपनी जटाएं खोलकर खडे़ हो गए। लेकिन गंगा का बहाव इतना तेज था कि वह पृथ्वी को बहा ले जातीं। लेकिन भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में संभाल लिया। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी जटाओं से गंगा की पतली धारा में धरती पर छोड़ा, जो अब धरती पर ही समाहित हैं।
दूसरी कथा
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, देवी गंगा को अपने पवित्र रूप पर गर्व था। जब ब्रह्मा ने उन्हें पृथ्वी पर उतरने को कहा तो वह बोलीं कि “मैं इतना पावन जल हूं कि धरती मेरा स्पर्श करने योग्य नहीं है।”
तब ब्रह्मा ने कहा, “तुम्हें शिव के मार्ग से गुजरना होगा।” गंगा ने इसे चुनौती के रूप में लिया और तीव्र वेग से शिव की ओर बहने लगीं, ताकि वे उन्हें सहन न कर सकें।
लेकिन भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उन्हें अपनी जटाओं में उलझा लिया और वर्षों तक वहीं रोके रखा। गंगा को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी। इसके बाद ही उन्होंने गंगा को धीरे-धीरे पृथ्वी पर छोड़ा।

