दमोह गणेश मंदिर इतिहास: जिस मंदिर ने मुगलों को कभी धूल चटाई अब वह उपेक्षा का शिकार होता दिखाई दे रहा है… मंदिर में चारों ओर संनाटा है…इस मंदिर का सम्रद्ध इतिहास इसके अतीत की आज भी गवाही देता है।
दमोह गणेश मंदिर इतिहास: ऐतिहासिक गणेश मंदिर
मप्र के दमोह जिले के नससिंहगढ़ में सुनार नदी के तट पर बसा ऐतिहासिक गणेश मंदिर खंडहर हो गया है…और अब गणेश जी की मूर्ति को मंदिर से निकालकर छोटी सी मढ़िया पर रखा गया है। इतिहासकार बताते हैं कि यह मूर्ति लगभग 300 वर्ष पुरानी है। और यह मंदिर नरसिंहगढ़ स्थित मराठाकालीन गणेश प्रतिम जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर स्थित है।
विरान खंडहर हुआ ऐतिहासिक गणेश मंदिर
मराठा सूबेदार के वंशज बताते हैं कि मराठा कालीन किले के ठीक सामने सुनार नदी के मुहाने पर बना गणेश मंदिर अब विरान होने की कगार पर है… वहीं दूसरी ओर उससे कुछ ऊपर बना सोमेश्वर महादेव का मंदिर अब पूरी तरह विऱान हो चुका है। प्रभु श्री राम औऱ माता जानकी औऱ बजरंगबली का भी कुछ ऐसा ही हाल है। इन मंदिरों को 17 वीं शताब्दी में मराठा शासक पांडुरंग राव करमरकर द्वारा बनवाया गया था.
त्योहारों पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालू आया करते थे
एक समय हुआ करता था कि तीज त्योहारों पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालू आया करते थे… मंदिर में दिनभर चलह पहल बनी रहती थी। सुबह से ही मंदिर में भक्तों की लंबी लंबी कतारें देखने को मिलती थी। आज वह मंदिर भक्तों के बिना सूना पड़ा हुआ है। अब उस मंदिर की देखभाल के माली और एक पुजारी के हाथों में है। प्रभु गणेश जी 3 फीट की सबसे प्राचीन प्रतिमा अब मढ़िया में रखी हुई है।
महाराजा छत्रसाल ने मांगी थी सहायता
पांडुरंग राव के वंशज बताते हैं कि 1727 में जब मुगलों ने बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल पर आक्रमण किया था तो उन्होंने बाजीराव पेशवा को पत्र लिखकर सहायता मांगी थी।
पत्र पढ़ते ही बाजीराव पेशवा बिना देरी के महाराजा छत्रसाल की सहायता के लिए पहुंच गए औऱ मुगलों को मार भगाया । और इतना ही नहीं बाजीराव पेशवा ने आपने खास व्यक्ति को पांडुरंग राव करमरकर को नरसिंहगढ़ सूबे का सूबेदार बना दिया.
जानिए क्यों पड़ा नसरतगढ़ का नाम नरसिंहगढ़
महाराजा पेशावा जी मुगलों को भगाने के बाद नसरतगढ़ को बदलकर नरसिंहगढ़ करने का आदेश दिया…

तब सूबेदार पांडुरंग राव करमरकर ने किले के साथ ही
राम जानकी,
हनुमान,
सोमेश्वर महादेव
तथा सुनार
तट पर गणेश मंदिर की स्थापना करवाई थी..
ब्रिटिश गजेटियर के लेखक आर वी रसल ने भी अपने लेख में विस्तार से मराठा शासनकाल का उल्लेख किया है.
बिन भक्तन सब सून…
इतिहासकार बताते हैं कि मराठा शासन में गणेश पूजन को बड़ा महत्व दिया जाता था… बड़े बड़े थालों में आरतियां सजाई जाती थीं… ढोल नगाडों के साथ गणपति भगवान की पूजा हुआ करती थी।
जब शाम को गणेश भगवान की आरती होती थी… तो हजारों की संख्या भक्ता पहुंचा करते थे…सूबेदार राजसी पूरे पोशाक में पूजा किया करते थे.. लेकिन अब यह मंदिर विरान की स्थिति में है।
एक मात्र है सिंदूरी गणेश मंदिर…
सबसे खास है दमोह जिले में ये अन्य कोई दक्षिणावर्ती मूर्ति नहीं है… कमल दल पर बैठे है सिंदूरी गणपति महाराज। फिर भी पुरातत्व विभाग की ओर से प्रतिमा के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं लिए जा रहे।
हमारे पुर्रवजों ने मुगलों-अग्रेंजो से लड़ी लड़ाई
सूबेदार पांडुरंग राव करमरकर के वंशज कहते हैं कि हमारे पुरखों ने मुगलों और अंग्रेजो से लड़ाई लड़ अपना बलिदान दिया… इसके बाद भी हमारी विरासत के हालात ऐसे हैं…
जब 1857 में अंग्रेजों ने पूरे गांव को वीरान कर दिया था, तब इस प्रतिमा को मंदिर से उठाकर छोटी सी मढ़िया में रख दी गई. लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण किला और मंदिर दोनों ही खंडहर होते जा रहे हैं.

