Chaitra Navratri 4th Day: चैत्र नवरात्रि 2026 का चौथा दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप देवी कुष्मांडा को समर्पित है। हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। ऐसे में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। आइए जानते हैं मां कूष्मांडा की पूजा विधि, व्रत कथा और मंत्र…
प्रिय रंग और भोग
मां कुष्मांडा को हरे रंग का भोग प्रिय होता है, इस दिन हरे रंग के फल जैसे केला, अंगूर का भोग लगाएं, लगाना शुभ होता है। साथ ही माता को मालपुए का भोग भी अति प्रिय है। मान्यता है कि माता को उनकी पसंद का भोग अर्पित करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
इसके अलावा मां को नारंगी, पीला और हरा रंग माता रानी को प्रिय होता है, जो ऊर्जा, प्रसन्नता और सकारात्मकता का प्रतीक हैं।
कैसे करें मां कूष्मांडा की पूजा?
नवरात्रि के चौथे दिन पहले सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहने। इसके बाद हाथों में पुष्प लेकर मां का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। फिर विधि-विधान से मां कूष्मांडा की पूजा करें। पूजा के दौरान उनकी कथा सुनें और मंत्रों का जाप करें। अंत में मां की आरती उतारकर भोग लगाएं और प्रसाद सभी में वितरित करें।

शास्त्रों के अनुसार, मां कूष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। उनकी कृपा से भक्तों को स्वास्थ्य, ऊर्जा और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
मां कूष्मांडा के प्रमुख मंत्र
पूजा के बाद इन मंत्रों का जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है:
मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
मूल मंत्र
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः
बीज मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः
स्तुति मंत्र
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्मांडा यशस्विनीम्॥
व्रत कथा
देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है। पुराणों के अनुसार, जब चारों ओर घोर अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी एक हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उनका नाम “कूष्मांडा” पड़ा।

अष्टभुजाओं वाली मां कुष्मांडा
मां कूष्मांडा अष्टभुजा स्वरूप में विराजमान हैं। उनके आठ हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला सुशोभित हैं। उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। मां को कुम्हड़ा (कद्दू) अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है। उनका निवास सूर्य मंडल में माना जाता है और उनके तेज की तुलना सूर्य से की जाती है।
मां कूष्मांडा की आराधना से भक्तों को आरोग्य, बल, आयु और यश की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

