Bastar Dussehra Rituals: बस्तर दशहरा, भारत का सबसे अनूठा और लंबा चलने वाला पर्व है, जो धार्मिक आस्था, परंपरा और जनसामूहिक उत्सव का संगम माना जाता है। इस पर्व की सबसे प्रमुख और रहस्यमयी परंपराओं में से एक है काछनगादी विधान। इस विधान में एक कन्या को काछन देवी का स्वरूप मानकर विशेष कर्मकांड संपन्न कराया जाता है।
इस वर्ष फिर से चर्चा में है पीहू, जिन्हें लगातार तीसरी बार काछन देवी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आइए जानते हैं कि पीहू कौन हैं, काछनगादी का महत्व क्या है और इसमें कौन-कौन से अनुष्ठान होते हैं।

पीहू कौन हैं?
पीहू को बस्तर दशहरा में काछन देवी का रूप माना गया है। यह लगातार तीसरा वर्ष है जब पीहू को काछनगादी विधान के लिए आमंत्रित किया गया है। पीहू इस अवसर को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानती हैं और बेहद उत्साहित हैं।
कांटों से बने झूले पर झूलना
काछन देवी बनी कन्या को देवी स्वरूपा मानकर पूजा जाता है। इस वर्ष पीहू कांटों से बने झूले (बेल के कांटों का झूला) पर झूलकर रथ परिक्रमा की अनुमति देंगी। पीहू के माध्यम से पूरा अनुष्ठान संपन्न होगा और काछनगादी विधान का समापन होगा।

काछनगादी परंपरा क्या है?
बस्तर दशहरा सिर्फ रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जनजातीय आस्था और आदिवासी संस्कृति का पर्व है। काछनगादी विधान इसकी सबसे पुरानी और रहस्यमयी परंपराओं में से एक है। इसमें काछन देवी के रूप में एक कन्या को चुनकर अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।
Bastar Dussehra Rituals: काछन देवी का महत्व
काछन देवी को शक्ति और आस्था का प्रतीक माना जाता है। आदिवासी समाज का विश्वास है कि देवी का आशीर्वाद मिलने से बस्तर में शांति, समृद्धि और अच्छी वर्षा होती है।
काछनगादी विधान में क्या होता है?
सबसे पहले एक नाबालिग कन्या को काछन देवी का रूप मानकर आमंत्रित किया जाता है। इस बार पीहू को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। काछन देवी बनी कन्या को बेल के कांटों से बने झूले पर झुलाया जाता है। यह झूला प्रतीक है — त्याग, आस्था और शक्ति का। माना जाता है कि झूले पर झूलने के बाद देवी स्वयं रथयात्रा को अनुमति देती हैं।

रथ परिक्रमा की अनुमति
जब काछन देवी (इस बार पीहू) झूले पर झूलकर आशीर्वाद देती हैं, तभी रथ परिक्रमा शुरू होती है। बिना काछन देवी की अनुमति के दशहरा की रथ परिक्रमा अधूरी मानी जाती है।
Bastar Dussehra Rituals: आस्था और विश्वास
यह परंपरा बस्तर के जनजातीय समाज की देवी शक्ति में गहरी आस्था को दर्शाती है। आदिवासी मान्यता है कि काछन देवी की पूजा से क्षेत्र में खुशहाली और सुरक्षा बनी रहती है।
काछनगादी का अनोखापन
बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जो इसे भारत के अन्य दशहरों से अलग बनाता है। इसमें रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि यह मां दंतेश्वरी की पूजा और विभिन्न विधान केंद्रित उत्सव है। भारत में ऐसा अनुष्ठान कहीं और देखने को नहीं मिलता। कांटों के झूले पर झूलना और देवी के रूप में कन्या को पूजा जाना इसे अद्वितीय बनाता है।

