Radharani Temple MP: वृंदावन में राधा रानी के कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा ही प्रसिद्ध मंदिर विदिशा में है, जो कि बेहद प्रसिद्ध है और इस मंदिर में बहुत प्रचीन प्रतिमा विराजमान है। यह मंदिर विदिशा जिले के नंदवाना की वृंदावन गली में स्थित है। जोकि लगभग 476 साल पुराना है। यह ऐसा मंदिर है जो साल में सिर्फ एक दिन ही खुलता है।
किसने की थी मंदिर की स्थापना
श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी द्वारा राधा रानी जी के इस मंदिर की स्थापना की गई।यह मंदिर राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़ा है। यह मंदिर विदिशा के नंदवाना की वृंदावन गली में स्थित है। जोकि बेहद प्रसिद्ध है। इस मंदिर को वृंदावन के बाद भारतवर्ष का दूसरा राधा रानी मंदिर माना जाता है। यह मंदिर इतिहास और अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।
साल में एक बार ही खुलता है मंदिर
स्थानीय निवासी बताते हैं कि, इस मंदिर में विराजमान श्री राधा रानी जी की प्रतिमा विधिशा के पूर्वज इन प्रतिमाओं को गंगा जी की डलिया में छुपाकर वृंदावन से विदिशा लेकर आए थे। तब इस स्थान पर न कोई घर न कोई किला था यहां सिर्फ चारो – तरफ जंगल था। किले के बाहर यहां कोई बस्ती नहीं थी। यहां गुप्त रुप से राधारानी जी की 9 इंच की अष्टधातु की प्रतिमा यहां लाई थी। तब से यहां गुप्त सेवा की परंपरा चली आ रही है। इस मंदिर में राधारानी के अलावा राधावल्लभ जी सहित ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपक, लता आदि सहेलियां भी विराजमान हैं।

वृंदावन से लाई गई थी राधारानी जी की प्रतिमा
एक समय मुगल आक्रांता औरंगजेब भारत आएं और मंदिर को तोड़ रहे थे। उस दौरान राधावल्लभ संप्रदाय के सेवकों ने अपने प्राणों की आहुति देकर राधारानी की अष्टधातु प्रतिमा को वृंदावन से सुरक्षित विदिशा लेकर आए थे। तब से इस मंदिर में गुप्त सेवा की परंपरा चल रही है। इस मंदिर के पट साल में एक बार ‘राधाष्टमी’ के दिन ही खोले जाते है। राधाष्टमी के दिन दूर – दूर से भक्त यहां दर्शन करने आते है। यह मंदिर न सिर्फ आस्था का प्रतीक है बल्कि यह प्रचीन सांस्कृति की धरोहर भी माना जाता है।
1669 में मुगल ने चलाई थी मंदिर तोड़ने की मुहीम
साल 1669 में मुगल आक्रांता औरंगजेब ने सभी हिंदू मंदिर तोड़े जाने के आदेश दिए थे। वृंदावन और ब्रज के मंदिरों पर कई बार हमले किए गए। 1670 में श्री राधा जी मंदिर को तोड़ा गया और वहां की संपत्ति लूट ली। लेकिन वहां मौजूद सेवाधारियों ने साहस दिखाते हुए राधा जी और श्रीजी की अष्टधातु प्रतिमाओं को सुरक्षित बाहर निकालकर वहां से छिपाकर विदिशा लगाया गया। यह मंदिर आज भी अपनी प्राचीनता और भव्यता के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

