Maa Ganga avatar on Earth: हिंदू धर्म में गंगा नदी को को एक पवित्र नदी माना जाता है, यहां गंगा नदी को मां का दर्जा दिया जाता है। कहा जाता है, इस नदी में स्नान करने से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं और आत्मा शुद्ध होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गंगा माता धरती पर कैसे आई और भगवान शिव की जटाओं में कैसे स्थापित हुईं?
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भगीरथ ने की तपस्या हुआ गंगा का अवतरण…
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सागर के वंशज भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्माओं को मोक्ष दिलाने के लिए कठिन तपस्या की। राजा सागर के 60,000 पुत्रों का अंतिम संस्कार न होने के कारण उनकी आत्माओं को मोक्ष नहीं मिला, भगीरथ की तपस्या से ब्रम्हा जी प्रसन्न हो गई तब भगीरथ ने ब्रम्हा जी से गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर भेजने की प्रार्थना की, ताकि वो अपने पूर्वजों की अस्थियों से गुजरते हुए उन्हें मोक्ष दिला सके।
ब्रम्हा जी ने कहा कि गंगा का प्रवाह इतना तेज होगा कि वह पृथ्वी को नष्ट कर सकती है, इसलिए किसी देवता को उसे नियंत्रित करना होगा।

भगवान शिव ने संभाली गंगा की धारा…
भगीरथ की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर उनसे प्रसन्न हो गए और उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में समाने का वरदान दिया जैसे ही गंगा मईया स्वर्ग से उतरीं, उनका प्रवाह काफी तेज था, तो भगवान शंकर ने अपनी जटाएं खोल ली और गंगा माईया उनकी जटाओं में समा गईं। शिव जी ने अपनी जटाओं में उलझाकर नियंत्रित किया और फिर धीरे-धीरे एक पतली धारा पृथ्वी पर छोड़ी, जो आज गंगा नदी के रुप में प्रवाहित हो रही है, जो गंगा माईया के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध है।

गंगा को जटाओं में धारण करने की वजह से भगवान शिव को ‘गंगाधर’ कहा जाने लगा, अर्थात् गंगा को धारण करने वाले। यह नाम उनकी करुणा, सहनशीलता और विनम्रता का प्रतीक है।
एक अन्य कथा…
पौराणिक कथा के अनुसार, गंगा को अपनी पवित्रता पर गर्व था। ब्रम्हा ने उन्हें पृथ्वी पर उतरने के लिए कहा तो वो तेज बहाव से शिव की ओर बढ़ने लगी, शिव जी ने मुस्कुराते हुए अपनी जटाओं में गंगा को कैद कर लिया। बताया जाता है कि कई वर्ष बीत जाने के बाद मां गंगा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शंकर से क्षमा मांगी, जिसके बाद ही उन्होंने उन्हें धीरे – धीरे पृथ्वी पर छोड़ा।

गंगा दशहरा और पूजा महत्व…
गंगा का अवतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था। इसे आज भी गंगा दशहरा के रुप में मनाया जाता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा में स्नान कर पुण्य और मोक्ष की कामना करते हैं।
आध्यात्मिक महत्व…
गंगा जल सिर्फ भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक प्रतीक है। यह शुद्धि , चेतना और मोक्ष का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक कार्यों, तर्पण, श्राद्ध और पूजा में गंगाजल का उपयोग करना अनिवार्य होता है।

